मुंज उपनयन संस्कार

मुंज उपनयन संस्कार

उपनयन संस्कार जिसमें जनेऊ पहना जाता है और विद्यारंभ होता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं।


ब्राह्मण का उपनयन कब होता है?गृह्यसूत्रों के अनुसार ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार आठ वर्ष की क्षत्रिय का ग्यारह वर्ष की और वैश्य का बारह वर्ष की अवस्था में किया जाता था। तीव्र बुद्धि वाले ब्राह्मण का पाँच, बलवान क्षत्रिय का छः और कृषि आदि करने की इच्छा वाले वैश्य का आठ वर्ष की अवस्था में भी यह संस्कार किया जा सकता था।

हिंदू धर्मों के 16 संस्कारों में से 10वां संस्कार है उपनयन संस्कार। इसे यज्ञोपवित या जनेऊ संस्कार भी कहा जाता है। उप यानी पानस और नयन यानी ले जाना अर्थात् गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार। प्राचीन काल में इसकी बहुत ज्यादा मान्यता थी।


उपनयन क्यों किया जाता है?

उपनयन संस्कार एक लड़के के जीवन में एक युग के अंत और दूसरे में दीक्षा का प्रतीक है। इस संस्कार से लड़का अपना बचपन छोड़कर मनुष्य बनने की ओर अग्रसर होता है और ज्ञान प्राप्ति के मार्ग पर चलता है। लेकिन, आधुनिक समय में, यह अनुष्ठान तब किया जा सकता है जब किसी पुरुष की शादी हो जाती है।

जनेऊ धारण संस्कार के नियम

शरीर से जनेऊ नहीं उतारना चाहिए । इसे साफ करने के लिए कंधे पर घुमाकर धो सकते हैं। एक बार जब कोई व्यक्ति धागा पहन लेता है तो वह उसे उतार नहीं सकता है। गंदा होने पर उतारकर तुरंत दूसरा धागा पहनना पड़ता है।


पुराने जनेऊ का क्या करे?

जनेऊ यदि 4 माह से पुराना हो जाए या उसका कोई तार टूट जाए तो उसे बदल लेना चाहिए। यदि यज्ञोपवीत शरीर से बाहर निकल जाए तो प्रायश्चित स्वरूप गायत्री का जप करना चाहिए।


जनेऊ पहनने से क्या लाभ होता है?

ऐसे में व्यक्ति कब्ज आदि परेशानियां नहीं होतीं और पेट अच्छे से साफ होता हैजनेऊ धारण करने और इसके पूरे नियमों का पालन करने से बुरे सपने नहीं आते. जनेऊ पहनने से शरीर में रक्त प्रवाह अच्छी तरह होता है. ऐसे में हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की समस्या नहीं होती और व्यक्ति की स्मरण शक्ति बेहतर होती है.

जनेऊ पहनने का वैज्ञानिक कारण क्या है?

लंदन में हुए एक शोध के अनुसार हिंदुओं द्वारा मल- मूत्र त्याग के समय कान पर जनेऊ लपेटने का वैज्ञानिक आधार भी है। शोध के अनुसार शौच के समय जनेऊ को कान के ऊपर लपेटने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर दबाव पड़ता है, जिनका संबंध सीधे आंतों से होता है और इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की समस्या दूर हो जाती है।

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